इस संग्रह के संदर्भ में बतकूचन का अर्थ इस शब्द के मर्म को पूरी तरह से प्रतिध्वनित नहीं करता। बतकूचन अर्थात निरुद्येश्य-सी बातचीत बेरोक-टोक बतकहियों का लम्बा सिलसिला यहाँ-वहाँ की बातों पर चर्चा। वस्तुतः ग्रामीण या उँनींदे कस्बाई लोक के एक बड़े भाग में 'समय बिताने के लिए' कोई व्यक्ति कुछेक जान-पहचान के जनों के साथ कुछ अपनी-कुछ जग की सुनता सुनाता बतियाता किस्सागोई की पटुता के साथ विभिन्न जानकारियाँ साझा करता है। यही है उस व्यक्ति के द्वारा किया जाता बतकूचन। लेकिन इस संग्रह के सभी 'बतकूचन' अनायास-सी बतकहियाँ न हो कर वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में भोजपुरी लोक-समाज की भाषा इसकी परम्परा इसकी सामाजिकता इसके लोक-व्यवहार इसके सुख-दुख इसके लोक के मनोविज्ञान की दशाओं की परतें खोलने का काम करने के साथ-साथ वर्तमान आधुनिकता के पूर्व के समाज की चर्चा भी मनोयोग से उठाते हैं। इस संग्रह का उद्येश्य भी यही है भोजपुरी लोक के विभिन्न पहलुओं पर दृष्टिपात करना। इन बतकूचनों की भाषा का कलेवर लेखक ने खाँटी रखने की कोशिश की है। या कहें तो संग्रह की भोजपूरी भाषा शहरी प्रभाव से अछूती-सी है। इन बतकूचनों में लेखक ने या फिर इसके पात्रों ने अपनी उक्तियों के कथ्य में विषयगत बिन्दुओं को भाषायी सौंदर्य तथा वाक्-चातुर्य को औदार्य से पिरो कर उन्हें रुचिकर बना दिया है। जिससे पाठक की उत्सुकता और जिज्ञासा लगातार बनी रहती है।