‘बहती धारा नदिया की’ की विषय वस्तु ऐसी है कि एक बार जब आप इसे पढ़ना शुरू करते हैं तो फिर इसे समाप्त किये बिना रह ही नहीं सकते। यह एक उपन्यास ही नहीं एक ऐसा संस्मरणात्मक विृत्तांत भी है जो कि काल्पनीक होते हुए भी सत्य है। और सत्य होते हुए भी काल्पनीक! सब कुछ देखा सुना पढ़ा तथा अनुभव किया हुआ जैसा है।