मनुष्य निश्चित ही अनिश्चित सम्भावनाओं का प्रतिरूप है। सृष्टि के सम्मुख नवीन सृजन की कल्पना गढ़ने वाला और उन्हें मूर्त रूप देने वाला मनुष्य वर्तमान में किस मानसिक त्रासदी से गुजर रहा है सहज इसका बोध होना आवश्यक है। इस कृति में सम्पूर्ण जीवन मात्र अवकाश के क्षणिक सुखों में व्यतीत कर कर्म से विमुख हो जाने और अपनी प्रकृति के विरुद्ध जाकर असीम सम्भावनाओं को अवरुद्ध कर देने वाले स्वभाव पर कटाक्ष किया गया है। हताश और निराश मन सृजन के मार्ग को जटिल बना देता है। इसी परिकल्पना को ध्यान में रखते हुए इस कृति में मन को आलस्य त्याग कर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी गयी है। साथ ही यह काव्य-कृति वर्तमान मानवीय मन की विक्षिप्तता को उकेरती है। मन विभिन्न भावों का कोश है। इस कृति में आपको इन भावों से साक्षात्कार होने का अवसर मिलेगा मेरा ऐसा विश्वास है। ‘बहुत हुआ अवकाश मेरे मन’ शीर्षक मनुष्य को जीवन की सार्थकता का भान करने की प्रेरणा से प्रेरित हो कर लिया गया है।