सीमा आज़ाद की कहानियों को पढ़ना एक आत्मसजग और दायित्वबोध से परिपूर्ण रचनाकार के चश्मे से दुनिया को देखना-समझना है। आरोपित किस्म की शिल्पगत और कथ्यगत जटिलताओं से दूर ये कहानियाँ अपनी सहजता में ही रचनात्मक तेवर को अभिव्यक्त करती हैं जाहिर है एक कथाकार के लिए ऐसी सहजता अर्जित करना आसान नहीं होता। सीमा की कहानियाँ दुनिया का सबसे बड़ा जनतन्त्र होने का दावा करने वाले देश के भीतर ‘जन’ की वास्तविक स्थितियों का चित्रण इस तरह करती हैं कि उन्नति का सब्ज़बाग दिखाने वाले शत्तिफ़ केन्द्रों की असल मंशा का पर्दाफाश होता है। विकास के बड़े-बड़े दावे करने वाले हमारे सत्ताधीश हर कदम पर जनता को छलते हैं सीमा आज़ाद की कहानियाँ हमसे यह प्रश्न करती हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे समूचे लोकतन्त्र की बुनियाद इन्हीं छलों और षडयंत्रों टिकी हो? यह प्रश्न एक ज़रूरी प्रश्न है क्योंकि इसका उत्तर ढूँढने के लिए अन्य चीज़ों के साथ-साथ आज ‘राष्ट्र’ और ‘राष्ट्रवाद’ का जो कातिलाना उन्माद हमारे चारों तरफ तारी है उसकी बुनियाद में सड़ रहे षडयंत्रों और साजिशों के ईंट-गारे की पड़ताल करना ज़रूरी हो जाता है इस प्रश्न को नज़रअंदाज करने की प्रवृत्ति जहां हमारी राजनीति में बढ़ती जा रही है वहीं साहित्य में आज इस प्रश्न की अहमियत लगातार बनी हुई है। यह राजनीति में साहित्य के हस्तक्षेप का एक कारगर तरीका है। सीमा आज़ाद की कहानियाँ साहित्य के इस हस्तक्षेप की गवाही देती हैं।--प्रियम अंकित
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