‘भाप बन उठती जीवन की गंध’ कनक किशोर की इधर की लिखी हिन्दी कविताओं का नया संग्रह है। कनक किशोर हिन्दी एवं भोजपुरी दोनों ही भाषाओं में लिखते हैं। वे कविताएं कहानियां आलोचना के साथ-साथ कथेतर गद्य भी लिख रहे हैं। वे एक कुशल संपादक एवं अनुवादक भी हैं। वैसे तो वे भोजपुरी के एक कालजयी साहित्यकार स्मृति शेष चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह के सुपुत्र हैं और जो कुछ वर्षों पूर्व झारखंड में वनाधिकारी के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद निरंतर साहित्य सृजन में लगे हुए हैं। साहित्य के संस्कार तो उनमें बचपन से ही रहे होंगे और वे अवश्य ही कुछ न कुछ लिखते-पढ़ते भी रहे होंगे। हालांकि सरकारी सेवा से मुत्तफ़ होने के बाद तो जैसे उनके साहित्य सृजन को पंख लग गए हों! उनमें साहित्यिक रचनात्मकता का विस्फोट देखने को मिल रहा है। पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी एवं भोजपुरी में एक के बाद एक उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। उसी शृंखला में उनकी नयी काव्य कृति है यह।