‘भारत कैसे बने विश्वगुरु' पुस्तक भारत को विश्वगुरु बनाने की योजना का प्रस्तुतीकरण है। भारत जो विश्वगुरु था प्रकृति व संस्कृति का देश था और एक आध्यात्मिक समाज का प्रतिनिधि था धीरे-धीरे पिछले पचास-साठ वर्षों में देखते ही देखते अध्यात्म से एक भौतिक देश में बदलता जा रहा है। पुस्तक में स्वर्णिम इतिहास की झलक दिखाते हुए भारत को पुनः विश्वगुरु की महान व उच्चतम पदवी पर बिठाने की योजना प्रस्तुत की गई है।पुस्तक के प्रारंभ में भारत के विषय में इस दृष्टि से चर्चा की गई है कि भारत क्या था व आज क्या हो गया है। हमारे गरिमामय अतीत को समझने के लिये उन पक्षों को सामने रखा गया है जिनसे पता चल सके कि भारत का इतिहास कितना स्वर्णिम था। भारत की संस्कृति को सनातन कहा जाता है जिसका तात्पर्य है कि देश काल व परिस्थिति बदलने पर भी सदा बनी रहने वाली संस्कृति।हमारे पूर्वजों ऋषियों गुरुओं ने जो शाश्वत मूल्य तलाशे; उन पर एवं जो भारत की मूल विद्याएँ हैं उन पर एक-एक अध्याय प्रस्तुत किये गये हैं। ततपश्चात आज की शिक्षा व भारतीय शिक्षा में आए बदलाव का विवरण दिया गया है।भारत को विश्वगुरु बनाने भारत की संस्कृति को विश्व में फैलाने के लिये विश्वगुरु विद्यापीठ परिषद के गठन एवं विश्वगुरु योजना को पुस्तक में प्रस्तुत किया गया है। इसमें अन्तर्राष्ट्रीय योजना राष्ट्रीय जिला विकास योजना विद्या केन्द्रों में संस्कृति केन्द्र भारतीय विद्याओं के गुरुकुल संस्कृति केन्द्र साहित्य केन्द्र आदि अनेक योजनाओं का विस्तार से वर्णन किया गया है ताकि भारत देश की सरकार राज्यों की सरकार शिक्षक अधिकारी बेरोजगार सभी इस योजना को समझकर इससे जुड़ सकें। हमारे देश की विद्याओं के गुरु जब देश व दुनिया में फैल जायेंगे तभी भारत विश्वगुरु बन सकेगा। यही इस पुस्तक का मुख्य संदेश है।-प्रो. डॉ. रचना तैलंग
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