पृथ्वी समेत यह पूरी सृष्टि अनादि काल से चलते चले आ रहे एक विलक्षण नाटक जैसी रचना है जिसके अनेक रहस्य अभी भी अनखुले हैं और मंच पर नित्य नए अंक खेले जाते हैं. देश काल और पात्र के संयोग-वियोग के बीच नए-नए दृश्यों के साथ यह नाटक चलता ही रहता है. कभी डायनासोर और बड़े हिंस्र पशु जो धरती पर राज करते थे शायद इस नाटक के मुख्य पात्र हुआ करते थे पर कहते हैं कुछ हजार सालों में इस महा नाटक में एक बड़ा मोड़ आया जब मनुष्य ने अन्य प्राणियों से बढ़त ले ली. भाषा और बुद्धि की क्षमता के साथ वह खेती करने के साथ अतीत तथा भविष्य के बारे में भी सोचने-विचारने लगा. मनुष्य निश्चय ही इस पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीवों में सर्वाधिक समर्थ है क्योंकि उसके पास भाषा की अमोघ शक्ति है जो घटनाओं को सुरक्षित रखने में सहायक होती है और स्मृति की सहायता से उसकी जानकारी या ज्ञान को पीढी दर पीढी तक पहुंचाती रहती है. लोग आते-जाते रहते हैं पर भाषा के कोड में सुरक्षित ज्ञान बचा रहता है. यद्यपि वह ज्ञान पूरी तरह स्थिर नहीं रहता है और उसमें वृद्धि या बदलाव भी सतत होता रहता है फिर भी वह एक विश्वसनीय आधार प्रदान करती है. इस ज्ञान की रचना करते हुए आदमी खुद को भी रचता जाता है और साथ में अपनी दुनिया भी रचता चलता है. ऐसा करते हुए उसे परिधि (बाउंड्री) बनानी पड़ती हैं क्योंकि परिधि या सीमा के बिना अर्थ का निश्चय मुश्किल हो जाता है. इसे यों भी कह सकते हैं कि हम परिभाषाएं गढ़ते हैं और उनसे स्वयं को परिभाषित करते रहते हैं और अपने प्रयोजनों के अनुकूल उन परिभाषाओं के साथ जीने का अभ्यास करते हैं.