हिंदू राष्ट्रवाद उनकी मूल काव्य-चिंता थीं। अंग्रेजों और अंग्रेज़ी राज के ख़िलाफ़ आलोचना उनकी कविताओं में कभी-कभार ही दिखाई पड़ती है जबकि इस्लाम और मुसलमानों के लिए लगातार विरोध का भाव मौजूद था। उन्हें अपने हिन्दू होने या कि आर्य मूल का होने पर लगातार गर्व की अनुभूति होती थीं। यही गर्व उनके राष्ट्रवाद की आधार चेतना बना। हिंदू श्रेष्ठतावाद भारतेंदु से शुरू होकर मैथिलीशरण गुप्त जयशंकर प्रसाद लक्ष्मीनारायण लाल श्यामनारायण पांडेय के साहित्य में भी झलकता है। यह श्रेष्ठतावाद या सांस्कृतिक जागरण आज भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के खोल में हमारे आस-पास मौजूद है। भारतेंदु युग पूर्णतः एक संक्रमणकालीन युग था। यह एक ऐसी द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया से गुजर रहा था जिसमें राजभक्ति और राष्ट्रभक्ति का द्वंद्व दरबारी संस्कृति और जनसंकृति की टकराहटमध्यकालीनता एवं आधुनिकता का संघर्ष वैष्णवभाव और क्रांतिधर्मिता की ऊहापोह पुरातनता और नवीनता तथा खड़ी बोली और ब्रज भाषा के मध्य अंतर्विरोध की स्थिति भारतेंदु युग में गहन स्तर पर देखने को मिलती हैं। ये द्वंद्व कहीं स्पष्ट तौर पर दिखाई देता है तो कहीं अस्पष्ट रूप में। ऐसी स्थिति में इन्होंने व्यंजनावृत्ति का सहारा लेकर प्राचीन रूढ़ियोंपरम्पराओं एवं अंधविश्वासों का विरोध करते हुए आधुनिक नवीन दृष्टि की ओर जनता को मोड़ने का प्रयास किया। हास्य-व्यंग्य के माध्यम से बुराइयों का पर्दाफाश करते हुए अंग्रेज शासकों की जनविरोधी दोहरी- चाल भी जनता के सामने लाने की कोशिश की। अंग्रेजों के अत्याचार अन्याय एवं शोषण भरी वृत्ति से जनता को जागृत करते हुए भारतेंदु ने कुशल साहसी साहित्यकारों एवं समाज सुधारकों जैसा कार्य किया था। ऐसे में युग को देखना परखना ज़रूरी हो जाता है कि जिसमें रहकर भारतेंदु ने साहित्य और संस्कृति को नवीन रास्ते पर लाने की कोशिश की। भारतेंदु जी अपने युग में एक समन्वयात्मक बुद्धि लेकर उदित हुए; उन्होंने न केवल अभिनय बल्कि संपूर्ण नाट्य क्षेत्र में जिस समन्वयात्मक प्रवृत्ति और विश्लेषण का परिचय दिया वह एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। उनके पात्र आदर्शोन्मुख यथार्थोन्मुख एवं रहस्योन्मुख इन तीन वर्गों में विभाजित दिखाई देता हैं। भारतेंदु ने जीवंत अभिव्यंजनाओं को जिन्दगी के विविध क्षेत्रों से एकत्रित किया और उन्हें नाटकों के माध्यम से समाज के सामने प्रकट किया।