इस पुस्तिका में भारतीय वीरगांनाओं द्वारा किए गए संघर्ष की गाथाओं के संकलन का छोटा सा प्रयास भर किया गया है। मैं स्वयं को इतिहास-लेखक नहीं मानता केवल इतिहास का एक अध्येता भर मानता हूँ। वैसे भी उपनिवेशवादी मानसिकता के इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास के लेखन के क्रम में नारी-योद्धाओं को वह स्थान नहीं दिया है जिसकी वे हकदार हैं। इतिहास में ऐसे बहुत से प्रसंग मिलते हैं जिनमे वर्णित है कि जब कभी ऐसा अवसर आया है भारत की आधी-आबादी ने जीवन के हर क्षेत्र में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर अपना सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की है। इस पुस्तिका में योद्धा से अभिप्राय उन सभी वीरांगनाओ से है जिन्होने शासन और सत्ता द्वारा जबरन थोपी गई अनुचित व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष किया। हमारे देश में पुरातन काल से ही नारी को अर्धांगिनी और समानधर्मा कहा गया है। देवी उभय भारती द्वारा आदि शंकराचार्य को दी गई शास्त्रार्थ की चुनौती इसका ज्वलंत प्रमाण है।मेरा केवल यही प्रयास रहा है कि भारतीयता के क्षितिज पर नारियों के अदम्य योगदान को उकेरा जाये ताकि अध्येताओं को एक ही पुस्तिका में इन नारी योद्धाओं के व्यक्तित्व और कृतित्व की संक्षिप्त झलक देखने को मिल सके खासकर उन्हे जिन्हे आजतक विस्मृति के अंधकार से ढका रहना पड़ा।