अरुण अर्णव खरे के इस कहानी संग्रह में संकलित कहानियाँ मध्यवर्गीय जीवन के एक ख़ास समय की कहानियाँ हैं। जब एक युवा अपने कैरियर निर्माण के लिए जीवन की आपाधापी उतार-चढ़ाव और आशा-निराशा के बीच सतत संघर्षशील रहता है। कल्पनालोक में गोते लगाते युवावर्ग की तमाम चिंताओं को घेरे ये कहानियाँ अपने भीतर गहरी संवेदनाओं से लबरेज़ हैं। संग्रह की कहानियों में कहीं अंधविश्वासों का उलझट्टा है तो कहीं अंतर्जातीय विवाह की समस्या। कहीं बचपन के दोस्तों को खोजने की स्वाभाविक ललक तो कहीं अपल्लवित प्रेम की हिलोरें। भ्रष्टाचार रोजगार की समस्या नौकरी में असंतुष्टि जैसे विषयों के साथ वे आरक्षण के उस विद्रूप चेहरे को भी उजागर करते हैं जिसने सामाजिक समरसता के नाम पर बहुतों को आहत किया हुआ है। कहानियाँ इन अर्थों में भी आकर्षित करती हैं कि इसमें कहीं दिवास्वप्न नहीं है न ही किसी बड़े समाधान का दावा। अर्थग्राह्यता क़ी खिड़कियाँ खोले सीधे ह्रदय तक उतरने वाली संवेदनाओं को समेटे संग्रह की कहानियाँ पाठक को पलकें झपकने का भी अवकाश नहीं देतीं। अरुण अर्णव खरे की कहानियाँ सही अर्थों में आलोचना की नहीं पाठक क़ी कहानियाँ हैं।
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