हे बुद्ध हे बुद्ध! क्या व्यर्थ हुई तुम्हारी शिक्षा! अक्रोध से क्रोध को भलाई से दुष्ट को दान से कंजूस को और जीत लो सच से झूठ को! तुम्हारी दृष्टि में मानव को होना चाहिए- शीलवान प्रज्ञावान और समाधिमान। स्वयं करे चौकीदारी रहे सदा गतिमान योग के बल से बने वह प्रज्ञावान चित्त को स्थिर कर बने वह सत्यवान। सदियां बीती न सीख सका मानव समस्त शिक्षालय-देवालय भी कहाँ उत्पन्न कर सके विवेक? नहीं सरोकर उनका शांति से आंखें बंद हैं उनकी आनन्द के उमड़ते हृदय सागर की ओर से। फिर से आना होगा हे बुद्ध! अस्त-व्यस्त-त्रस्त समय की त्रासद अवस्था में शांति शक्ति शीतलता ऊर्जा के लिए... हे बुद्ध!