सदगुरू सानिध्य में उपजी सरलता की नदी में डूबकी लगाकर मेरी अनुभूतियों को और अधिक संबल की किरण से नित-नित उपजे विचारों को मजबूती मिली। मेरी कृति अनुभूतियॉं इंद्रधनुष एवं मातृका के रूप में भी प्रकाशित हो चुके हैं। आज पुनः वह अवसर है कि आप पाठकों की मांग पर तृतीय संस्करण भावनाओं का दर्पण का प्रस्तुत करने जा रही हॅूं। आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आपकी भावनाओं पर भावनाओं का दर्पण खरा उतरेगा।