मेरी प्रस्तुत औपन्यासि क कृति ‘भोर’ यों तो कल्पना का अवलंब लेती है किन्तु बड़े साहस एवं उत्सा ह के साथ सत्य का उद्घा टन करती हुई अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत करती है। इसके साथ ही यह उस छवि को खंडित कर महि मामंडित करने का कार्य करती है जो अब तक अधि कतर कहानी या उपन्या स में शासक एवं शोषक के रूप में अत्यंत निंदनीय दि खाई देता रहा।
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