बिहार को अलग से देखने-समझने की दरकार तब हुई जब बिहार-विभाजन आसन्न था। नया राज्य झारखंड बिहार के उर्ध्व बँटवारे से अस्तित्व में आने वाला था। इसके निर्माण में किसी भी अन्य राज्य उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश पश्चिम बंगाल या ओडिशा की कोई साझेदारी या जिम्मेदारी नहीं थी। बिहार का तत्कालीन राजनीतिक वर्ग ही नहीं झारखंड आंदोलन के नेता भी इस ओर से उदासीन थे। अन्य राज्यों के आदिवासी इलाकों के लिए उन्होंने दावा ही नहीं किया किया भी तो आधे मन से। बिहार का बहुत कुछ जाने वाला था मूल्यवान खनिज संपदा कोयला लौह अयस्क ताम्र अयस्क अभ्रक और यूरेनियम की खानें-खदानें; बोकारो जमशेदपुर के विशाल इस्पातल संयंत्रों के अलावा सैकड़ों छोटे-बड़े उद्योग...। दक्षिण बिहार से ही शहरी बिहार की भी छवि बनती थी। राँची जमशेदपुर बोकारो धनबाद जैसे औद्योगिक शहरों का एक कॉस्मोपोलिटन माहौल बिहार की आधुनिक पहचान को दर्शाता था। शिक्षा-दीक्षा रोजगार एवं जीवन-स्तर के हिसाब से भी दक्षिण बिहार बीस बैठता था। उत्तर विहार के लोगों के लिए रोजगार की दृष्टि से वह सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण ठौर था। यह सब कुछ जाने वाला था लेकिन बिहार के कर्णधारों के लिए शायद इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। आम बिहारी की उद्विग्नता इस मुद्दे पर नजर नहीं आयी। राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील माना जाने वाला बिहार इस मुद्दे पर असंवेदित दिखा। मेरे जैसा एक ''पोलिटिकली इनकरेक्ट'' व्यक्ति (कुछ और लोग भी हो सकते हैं) तब भी एक उपाय आजमाना चाहता था- बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी किसी आदिवासी व्यक्ति को सौंप दी जाए। लेकिन आखिर यह होता कैसे? राजनीति तो प्रायः लेने के लिए ही होती है देने के लिए कब होती है। उद्देश्य चाहे कितना भी बड़ा हो। वैसे भी उस समय बिहार विभाजन राजनीति के एजेंडे पर था ही नहीं।
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