बिरजू नाई की दुकान कहने भर को नाई की दुकान है। असल में यह वही दुकान है जहां एक घूमता हुआ आईना हर समय घूमता रहता है और हमें नई-नई घटनाओं के रूबरू करवाता रहता है। भारत विविधताओं का देश है। एकता में अनेकता इसकी पहचान है। यह मान्यताओं का देश है। इस देश में प्रथाएं मान्यताओं का चोली दामन का साथ है। कई कुप्रथाएं भी इसी के साथ-साथ मुंह बाए ऽड़ी हैं। कई बार ऐसी बातें इस देश में आजीविका का साधन भी बनती हैं। इसके बावजूद विश्वास इस देश की संस्कृति का हिस्सा है। कई बार विश्वास अंधविश्वास में बदल जाता है तो कई तरह की विद्रूपताएं पैदा होने लगती हैं। इस उपन्यास में मनोज धीमान ने बड़ी सहज और सरल भाव से इस तरह की घटनाओं के इर्द-गिर्द अपने उपन्यास का हिस्सा बनाया है और एक नई जमीन खोदकर पाठकों को सोचने पर मजबूर किया है। अगर कहूं कि छोटी-छोटी कहानियों का कोलाज है उपन्यास गलत न होगा। ‘बिरजू नाई की दुकान’ उपन्यास बड़े ही रोचक ढंग से खुलता है। देश और दुनिया की बातें करता हुआ हिंदुस्तान के बच्चों की चिंता करता हुआ आगे बढ़ता है। हमारे देश के अधिकतर बच्चे पढ़ाई से वंचित रह जाते हैं। इस तरह के कई प्रश्नों के साथ उपन्यास आगे बढ़ता है।--डॉ. अजय शर्मा