मुकेश श्रीवास्तव की रचनाओं से वर्षों से परिचित हूँ जिनमें ये हिंदी और उर्दू शब्दों का प्रयोग बहुत खूबसूरत तरीके से करते हैं। कुछ समय पहले आपने एक उपन्यास लिखना प्रारंभ किया जिसे मैंने पढ़ा भी है। वैसे तो बहुत सारे विषय हैं जिस पर अक्सर लोग उपन्यास लिख देते हैं लेकिन आपने सबसे उपेक्षित विषय का चुनाव किया है। जीवन की संध्या में आँखों की जाती हुई रोशनी अपने लिए जो स्वपन देखती है आपने अपने लेखन में उन ख्वाहिशों को जगह दी है। मन का अकेलापन इस ढलती सांझ में एक ऐसा साथी चाहता है जिससे वह सुख-दुख की बात कर सके जीवन भर के अनुभवों को साझा कर सके। ऐसे ही एकाकी बुजुर्गों के जीवन पर आपने जीवंत लेखन किया है। प्रारंभ से ही आपके लेखन की यह शैली रही है कि आप स्वाभाविक सरल दैनिक जीवन में बोले जाने वाले शब्दों का बखूबी प्रयोग करते हैं। हिंदी भाषा में आपने तकनीकी शब्दों का भी जमकर प्रयोग किया है जो कि प्रासंगिक भी है। पाठकों को यह उपन्यास बहुत पसंद आएगा और भाषा शैली भी इतनी रोचक है कि आप प्रारंभ करने के पश्चात अंत तक पहुँचे बिना उपन्यास को रख नहीं पाएंगे। इस उपन्यास की विशेषता यह है कि इसका प्रारंभ ही वर्तमान जीवनशैली के अभिन्न अंग मोबाइल से होता है। उपन्यास का कथानक वर्तमान दौर में उपेक्षित जी रहे बुजुर्ग लोगों को ध्यान में रखते हुए रचा गया है। किस प्रकार उन्हें अपनी ही तरह एक एकाकी साथी मिल जाता है और शुरू होती है रोचक कथा...... हार्दिक शुभकामनाएं!- डॉ. निकिता त्रिवेदीप्राचार्य शिक्षा महाविद्यालय