देह के ज्वार-भाटे के बीच प्रेम का चाँद आत्मा के गगन पर खिलता और डूबता है। पूर्णिमा और आमावस्या के बीच ही कहीं प्रेम आकार लेता है और प्रकाश और अॅंधेरे की संधिरेखा पर ही आँसू और आग की पटकथा रची जाती है। उपन्यास ‘बुझाए न बुझे’ इसी प्रेम की कहानी कहता है। आदम और हव्वा की उस प्रेम कहानी को आँखों ने देखा और पंखों ने समेटा जो कहानी लाखों बरस से सुनी और सुनाई जा रही है। सुनने और सुनाने वाले हर युग में बदलते रहे हैं। बस नहीं बदला तो स्त्री और पुरुष के बीच का चुम्बकीय आकर्षण और विकर्षण। प्रेम की बारिश और घृणा का बवंडर। लेखक निमिष अग्रवाल की यह पहली किताब है जो पहले प्यार के जादुई एहसास और जज़्बात से भरी हुई। पहली किताब जैसे कि आँखों और पंखों की पहली उड़ान।.
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