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About The Book
Description
Author
चाय की बात चली है तो दूर तक जाएगी। हाँ जनाब! यह वही चाय है जिसे हम हर सुबह अख़बार की तरोताजा सुर्ख़ियों के साथ तो ढलती शाम के समोसे व पकौड़े के साथ बड़े चाव से चुस्कियाँ लेकर पीते हैं। मेरी और चाय की दोस्ती कब से हुई मुझे ठीक से याद तो नहीं परंतु इतना पक्का है कि इससे पहचान मेरी माँ ने कराई थी। फिर तो पता ही नहीं चला कब यह पहचान प्यार में बदल गई। जैसे प्यार का नशा सिर चढ़कर बोलता है... चाय का नशा सुबह के उठने के साथ और शाम के चार बजने के साथ चढ़ने लगता है। बस फिर तो हर जगह चाय-चाय ही दिखती है। -- बनारस से ताल्लुक रखने वाली युवा हिन्दी लेखिका वंदना सिंह फ़िलहाल दिल्ली शहर में रहती हैं। वंदना जी पेशे से ऑनलाइन व्यवसायी हैं। इन्होंने एम.ए एम.फिल बी.एड तक की शिक्षा हासिल की है। वंदना जी को कॉलेज के दिनों से ही लिखने की आदत थी। प्रस्तुत पुस्तक में इन्होंने आधुनिक भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में ख़ुश कैसे रहा जाय इससे सम्बन्धित बहुत से मूल मंत्र लिखे हैं। वंदना जी ने पुस्तक में लिखी बहुत सी बातों को ख़ुद के जीवन में आजमाया है। ख़ुद एक माँ गृहणी पत्नी और व्यवसायी होने के नाते जीवन की इस व्यस्तता को महसूस कर उसमें ख़ुशियाँ तलाशने की तरक़ीब को नज़दीक से जाना है।