जब इंसान स्वप्न के उड़नखटोले पर बैठकर खुले आसमान में उड़ता है तो उसे अद्भुत आनंद का अहसास होता है। लेकिन जब यही उड़नखटोला उसे हकीकत के घरातल पर उतारता है तो धरती की तपेदिक उसके पदों को घायल कर देती है जिसे सहन कर पाना आसान नहीं होता। आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में हर बच्चे को भाग लेना अनिवार्य हो गया है चाहे वह अपनी मर्जी से हो या परिवार की इक्षापूर्ति के लिए। नतीजतन कभी-कभी उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं मिलते कभी काबिलियत की कमी के कारण तो कभी चाहत की पूर्ति न होने से। इस दौड़ में कोटा जैसे कोचिंग हब में बच्चों की तादाद बढ़ रही है जहां से उनका उच्च शिक्षा और स्वाभिमान का सफर शुरू होता है। लेकिन कई बार यह देखा गया है कि जो कुछ भलाई के लिए बनाया गया होता है वह अक्सर बुराई में परिणत हो जाता है। आज कोटा एक शिक्षा का शहर होने के बजाय आत्महत्या का केंद्र बन रहा है जो अभी तक चेतावनी नहीं दे रहा है पर आने वाले कल में एक चिंतनीय विषय बन सकता है। इन्ही बढ़ती कुरीतियों को रोकने की कोशिश में माताएं अपनी जान जोखिम में डाल कर किस तरह साहस का परिचय देती है यह हमें आगे जानने को मिलेगा।