जहां ध्यान प्रेम की छांव है वही ओशो का गांव है। ओशो परम दुर्लभ घटना है आस्तित्व की।<br>ओशो की आवाज जब बहती हुई पवन की तरह किसी के अंतर में सरसराती है एक बादल की तरह बूंद-बूंद बरसती है और सूर्य की किरण होकर कहीं अंतर्मन में उतरती है तो चेतना का सुप्त बीज पनपने लगता है। फिर कितने ही रंगों का जो फूल खिलता है उसका नाम कुछ भी हो सकता है। बुद्धत्व की उपलब्धि में सदियों व जन्मों का तूफान शांत होता है। अस्तित्व का परम सौंदर्य उसमें खिलता है और अस्तित्वगत ऊंचाई का परम शिखर परम शून्यता में निर्मित हो उठता है। स्वामी ज्ञानभेद का यह 'ओशो का गांव' कहीं बाहर नहीं हमारे ही भीतर है। वो हमारे हृदय का उन्मुक्त आकाश है। इस कृति को पढ़ते हुए जब हम प्रकृति के रोमांच को अनुभव करते हैं तो हमें लगता है कि शायद हम सब उस गांव को तलाश रहे हैं।<br>प्रस्तुत पुस्तक में अध्याय दर अध्याय एक निर्बाध गति से बहती नदी का प्रवाह है। 'चल ओशो के गांव' का लेखक जीवन और जगत् के रहस्य से साक्षात्कार और आत्म अनुभव की अभीप्सा से व्याकुल हृदय है। प्रस्तुत पुस्तक के प्रथम दो खंड हृदय के बन्द द्वार खोलने का प्रयास हैं तो तृतीय खंड अंतर्यात्रा के मूल्यवान सूत्र अपने में संजोए हुए है।