अनुपमा तिवाड़ी का यह तीसरा कविता संग्रह उनके कवि स्वर को और मुऽर करता हुआ आया है। उनकी कविता में स्त्री का दर्द नहीं बल्कि उस दर्द से निकलने का संघर्ष उभरकर सामने आता है। अनुपमा एक जुझारू स्त्री के सौंदर्य को अपनी हर कविता में प्रमुऽ रऽती हैं। इनको कविता में जो ताकत दिऽती है_ वह ओढ़ी हुई नहीं वरन प्रकृतिदत्त है। यह अनायास नहीं कि अनुपमा वृक्षों से भी टूट कर प्यार करती हैं। आिऽर स्त्री और वृक्ष में मूलभूत कोई फर्क नहीं है। अनुपमा की स्त्री बिल्कुल पेड़ की तरह उगती कटती और छाया देती है फल देती है और इस पृथ्वी को हरा रऽती है।
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