मीर की शायरी इश्क़-ओ-मोहब्बत ज़िन्दगी के रंज-ओ-ग़म जीवन के दर्शन इसके उतार-चढ़ाव सामाजिक चेतना समाज में धर्म का स्थान बादशाहों का बनना-बिगड़ना मानव मूल्य और उनके आपसी सम्बन्ध आदि अनेक पहलू अपने अन्दर समेटे हुए है। जब हम मीर के शे’र पढ़ते हैं तो हर शे’र में कोई नसीहत कोई दर्शन कोई सन्देश कोई अनुभव छुपा रहता है। लेकिन मीर की शायरी की अस्ल बुनियाद इश्क़ है। मीर के पिता एक सूफ़ी थे और पिता ने मीर को बचपन से ही इश्क़ का पाठ पढ़ाया। बाप की इश्क़ की शिक्षा का मीर पर ऐसा असर पड़ा कि उनकी शायरी से इश्क़ का कोई पहलू अछूता न रहा। उनकी ग़ज़लों मस्नवियों रुबाइयों-सभी में इसी इश्क़ के तमाम नमूने भरे पड़े हैं जो पिछले ढाई सौ-तीन सौ वर्षों से हमारी शायरी का आधार हैं। दाग़-ए-दिल-ए-ख़राब शबों को जले है ‘मीर’ इश्क़ इस ख़राबे में भी चराग़ इक जला गया