मेरी दृष्टि में जीवन नैराश्यपूर्ण नहीं प्रत्युत अर्थपूर्ण व जीने योग्य है--प्रेम सद्भाव सत्य न्याय जीवन-मूल्यों और ‘होने’ से युक्त। परंतु समाज में व्याप्त विसंगतियों-विद्रूपताओं असंतोष और घटनापूर्ण मनःस्थितियों ने आज के मनुष्य को तोड़कर रख दिया है। कवि इन सारी स्थितियों को अनुभव करता है भोगता है और तनाव झेलने को विवश होता है_ तदंतर रचना-सत्य को अनुभूति की प्रामाणिकता से संजोता है। इस तरह लंबे समय तक झेले गए तनाव और उसकी विविधता की अभिव्यक्ति ही कविता का आकार लेती है। जब भाव और विचार की दशा बहुत सघन और तीव्र हो जाती है तो कविता में उतरने लगती है। इसमें भावदशाएँ मनोदशाएँ और विचार अंतर्गुंफित रहते हैं।-वरुण कुमार तिवारी
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