इन दिनों हास्य रस की कविता मंच पर सर्वाधिक लोकप्रिय है। हास्य रस की परंपरा को प्रतिष्ठित करने में अनेक रचनाकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसी शृंखला में रमई काका विमलेश राजस्थानी काका हाथरसी हुल्लड़ मुरादाबादी ओमप्रकाश आदित्य अल्हड़ बीकानेरी माणिक वर्मा और मुकुट बिहारी सरोज जी सरीखे अनेक महत्वपूर्ण नाम हैं जिन्होंने हास्य-व्यंग्य की कविता में अपना विशिष्ट योगदान दिया है। उपरोत्तफ़ कवियों में से अधिकांश कवि अपनी हास्य कविताओं में छंद का प्रयोग करते थे। समय के साथ-साथ कविता ने भी अपने तेवर बदले और धीरे-धीरे हास्य रस की कविता छंद से अतुकांत कविता और फिर बतरस और लतीफों की तरफ मुड़ गयी। ऐसे गंभीर बदलावों के बीच भी जिस रचनाकार ने निरंतर हास्य रस की शास्त्रीय कविता लिखकर केवल पाठकों और मंच के रचनाकारों को ही नहीं वरन साहित्य के गंभीर समीक्षकों को भी प्रभावित किया उनका नाम गुरु सक्सेना है। ...अंत में केवल यह कहना चाहता हूँ कि गुरु सक्सेना जी ने हास्य रस और विशेषकर छंद विधा में बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया है और अपने जीवन अनुभवों को छंदों में ढालकर एक व्यापक रचना संसार की निर्मित्ति की है।---डॉ.प्रवीण शुक्ल