अनुपम प्रकृति की गोद में अनवरत गहन यादों के आलिंगन में संध्या की कांतिमय वेला में और भगती-दौड़ती इस जीवन की जिजीविषा से परिपूर्ण क्षणों में एकत्रित हृदय के कुछ उद्गारों का तीसरा कविता संग्रह छाँव की धूप में सादर एवं प्रेमपूर्वक समर्पित हैI हृदय से आभारी हूँ मैं- अपने दिवंगत योद्धा पिताजी- श्री बिरेंद्र प्रसाद द्विवेदी उत्कृष्ट कर्मठ माँ- श्रीमती अन्नपूर्णा द्विवेदी मित्रवत् प्यारे भाई- प्रदीप द्विवेदी और सबसे अधिक: अपने प्रिय बहुमुखी प्रतिभा संपन्न सुपुत्र- उत्कर्ष शर्मा की!