CHHOTA SA HASTAKSHEP

About The Book

आज के प्रासंगिक कवियों की तरह कुल मिलाकर दिविक रमेश भी मूलतः समाजचेता हैं। किंतु उनमें एक आयासहीन निजी कोना भी है जो उनके कवि को एक अतिरिक्त आयाम देता है। उन्होंने अपनी कविता में शमशेर और त्रिलोचन की रंगतों का ऋण स्वीकार किया है और यदि शमशेर से शुरू करें तो ‘मौसम’ ‘एक समुद्र आत्मीय’ ‘पंख से लिखा खत’ ‘विदेशी शाम’ ‘जब भी लौटूंगा’ ‘यात्रांत’ तथा ‘पड़ावहीन यात्रा में’ सरीखी कविताओं में रागात्मकता कामना प्रकृति एकांत तथा स्मृति की वे खूबियां हैं जो एक ओर तो हिन्दी कविता में कम होती जा रही हैं और कुछ के यहां एक आत्ममुग्ध आत्मरतिग्रस्त प्रदर्शनवाद के तहत सायास लाई जा रही है इसलिए नकली हैं। दिविक रमेश की ऐसी कविताएं कुछ सिद्ध नहीं करना चाहतीं - यदि कवि के पास ऐसी अनुभूतियां हैं तो वह सिर्फ उन्हें अभिव्यक्त करना चाहता है - उनमें न तो ‘जमाना क्या कहेगा’ की वर्जनात्मक लोक-लाज है और न उसके बरक्स ऐन्द्रिकता की जांघ दिखाने का दुःशासन-दर्प है। और तो और अपनी विनम्र स्वाभाविकता में कवि कह देता हैः ‘कभी-कभार बैठना चाहिए हमें/ चाह कर भी/ अपने उदास क्षणों के पास’ जो आज की छप्र आशावादिता में एक कुफ्र के करीब है किंतु अततः इसी का परिचायक है कि कवि भी इंसान से बहुत ज्यादा नहीं है।--विष्णु खरे
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