गजल को विषय बनाकर गजल लिखने या कहने की परंपरा अत्यधिक पुरानी है । यह कोई नई बात नहीं है । गजल जहाँ कहीं भी और जिस भाषा में भी लिखी गयी हो या लिखी जा रही हो ; यह परंपरा सर्वत्र जीवित मिलती है । पहले की गजलों में गजल- रचना के गुण - धर्म और परिवर्तन प्रक्रिया को रेखांकित करने की कोशिश होती थी। डी एम मिश्र ने भी गजल को विषय बनाकर अनेक गजलें कही हैं लेकिन इनकी गजलों में सिर्फ गजल के गुण - धर्म और सामाजिक सरोकार या परिवर्तन प्रक्रिया की ही व्याख्या नहीं की गयी है । इस संग्रह में भी इस विषय पर अनेक गजलें मौजूद हैं जिनके अंतर्जगत में संजीदगी के साथ प्रवेश करके हम अपने समय समाज और राजनीतिक अंतर्विरोधों का मुकम्मल जायजा ले सकते हैं ।--नचिकेता