DALIT SAHITAYA : PARAMPARA AUR VINYAS


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About The Book

हिन्दी साहित्य में दलित विमर्श जैसे-जैसे एक अनिवार्यता बनती गई वैसे-वैसे सवर्ण साहित्यकार इस बात पर केन्द्रित होते गए कि कैसे दलित साहित्यकारों में विघटन उत्पन्न किया जाए । सम्भवत: इसका बीज- वपन दलित साहित्य की स्थापना के साथ ही हो गया था जब 1996 में श्री ओमप्रकाश वाल्मीकि को देहरादून में आयोजित एक समारोह में परिवेश - सम्मान प्रदान किया गया था । इस समारोह के अधिकांश वक्ताआंे ने अपने वक्तव्यों में कहा था कि जब हिन्दी साहित्य में प्रेमचन्द दलित चेतना के सबसे मुखर लेखक हैं औैैर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने भी बिल्लेसुर बकरिहा कुल्ली भाट और चतुरी चमार जैसी रचनाएँ लिखी हैं तो फिर किसी दलित को साहित्य लिखने की क्या आवश्यकता है ? समारोह के अध्यक्ष कथाकार काशीनाथ सिंह ने कहा था कि- “दलितों पर लिखने के लिए दलित होना आवश्यक नहीं है । हिन्दी में दलित लेखक हैं दलित साहित्य नही हैं ।” इस पर जब बर्दास्त से बाहर हो गया तो स्वयं ओमप्रकाश वाल्मीकि को ही प्रतिवाद करना पड़़ा था । उन्हांेने अपने आभार सम्बोधन में कहा था- “दलित के नाम पर वाल्मीकि और व्यास ने ब्राह्मणवाद की बात की है । कोई दलित होकर ब्राह्मणवाद की बात करता है तो वह दलित साहित्य का रचयिता कैसे हो सकता है ? व्यक्ति को मुक्त करने वाला साहित्य ही दलित साहित्य है । यह जनता का आन्दोलन है । तमाम हिन्दी साहित्य सवर्णवादी साहित्य है जो खलनायक को नायक का खिताब देता है । घटिया रचनाएँ छापी जा रही हैं । दलित साहित्य नहीं छापा जाता ।”
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