मीता दास उन कुछ कवियों में हैं जो अपनी कविता को समय की मार से बचाकर नहीं चलतीं बल्कि उन्हें जुल्मों के सामने झोंक देती हैं। वे बेझिझक मारक सवाल करती हैं और समय के सामने चुनौती बनकर खड़ी हो जाती हैं। आज के समय में ऐसी कविताएँ कम लिखी जा रही हैं। ‘अभिव्यक्ति के ऽतरे उठाने होंगे’ जैसा आ“वान महज जुमला होकर रह गया है। कवि जो ये ऽतरे उठाते हैं उठा लिये जाते हैं और ऐसे अँधेरे में फेंक दिये जाते हैं जहाँ कोई खिड़की नहीं होती जो इतिहास की तरफ ऽुलती हो। दम घोंट देनेवाले अनैतिहासिक अँधेरे सुरंग से होकर यह जो समय गुजर रहा है वहाँ मुट्ठीभर कवि हैं जो मशाल उठाये हुए हैं। मीता दास उन्हीं में से एक हैं। ‘देशद्रोह की हांडी’ महत्वपूर्ण कविता-संग्रह है। ‘देशद्रोह की हांडी’ नाम से एक कविता भी है संग्रह में जिसमें वे चेतावनी हुई साफ कहती हैं - ‘मीठा जहर पूरे देश में फैल रहा है/देश अब आपकी पकड़ से बाहर की बात है’। इस अर्थ में ‘क्या बचेगा’ कविता बेधक है जहाँ साफ दिखता है कि देशभक्ति और देश बचाना आज एक ही चीज नहीं है बल्कि एक-दूसरे के विपरित है। इस छोटी कविता में अंतिम सवाल है ‘खेत बचाएं या जन्मभूमि’। यहां खेत बचाना यानी कि कॉरपोरेट लूट का विरोध और (राम) जन्मभूमि बचाने का मतलब सांप्रदायिक उन्माद का मोहरा हो जाना है। दोनों स्थिति को सामने रखकर वे साहस से सवाल उठाती हैं। यह कविता फासीवाद से सीधा टकराती है।
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