सोलह कहानियों का ये संग्रह ‘ढलान-ढलान’ भावनाओं और संवेदनाओं के सोलह पायदानों की तरह है। हर कहानी का एक अलग विषय है और हर विषय की एक अलग दिशा। कुछ कहानियाँ बचपन के रंगों में रंगी हैं तो कुछ यौवन के नशे में भीगी। कुछ सामाजिक कुरीतियों पर कुठाराघात करती हैं तो कुछ आशावाद की ओर ले जाती हैं। कहीं हँसी है तो कहीं आँसू। खट्टे-मीठे अनुभवों के मोतियों से सजी ये किताब आपको कभी गुदगुदाएगी कभी सोचने पर मजबूर करेगी तो कभी आशावाद से भर देगी।