संघर्ष सदैव संबल मांगते हैं हमसे और आपसे। और इसी लिये इन्हें सुनना समझना और जो अव्यक्त रह गया हो उसको आवाज देना - आवश्यक हो जाता है । आज का आम आदमी अपने रोज के संघर्षों में स्वयं के अंदर ही लगातार एक द्वंद्ध जीता है जिसे वह जानता तो है पर कोई शक्ल या कोई तेवर नहीं दे पाता। धमनियां बोलती हैं आदमी के इस कफ़स को चिन्हित करती हुई कविताओं का संग्रह है । संग्रह की रचनाएं कई दुरूह अनुभवों पर सार्थक बहस खडी़ करती है और साथ ही उम्मीद की बात भी करती हैं । द्वंद्धवाद की पक्षधारी के साथ साथ रागात्मक प्रवृत्ति का एक ऐसा मिश्रण जिसे आप अवश्य पढ़ना चाहेंगे।