प्रस्तुत पुस्तक मेरे लिखित निबंधों का एक संकलन है। ये निबंध उन दो वर्षों के लिखे गए हैं जब भारत सहित सारा विश्व बड़े फासीवादी संकट के दौर से गुजर रहा है। यूरोप अमेरिका एशिया अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों में फासीवादी सत्ताएँ सिर उठा रही हैं। प्रतिरोध की ताकतें तत्कालिक रूप से पराजित हो गई हैं। भारत में आजादी के बाद नेहरू और डॉ भीमराव सहित अनेक नेताओं ने धर्मनिरपेक्षता लोकतंत्र तथा समाजवादी समाज की रचना का स्वप्न देखा था और जिसकी अभिव्यक्ति भारतीय संविधान में भी निहित है। आज संघ परिवार इन मूल्यों को तिरोहित करके देश को एक हिन्दूवादी फासीवादी राष्ट्र में बदलना चाहते हैं उसे इसमें कुछ हद तक सफलता भी मिली है। उसके इस एजेंडे का विरोध करने वाली ताकतें_ चाहे वो गांधीवादी हों समाजवादी हों कम्युनिस्ट या अम्बेडकरवादी हों अथवा उदारवादी बुद्धिजीवी हों। अल्पसंख्यकों के साथ-साथ इन सभी का भी दमन या उत्पीड़न किया जा रहा है। लेऽकों पत्रकारों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं को झूठे मुकदमों में फँसाकर जेल भेजा जा रहा है। उन्हें देशद्रोही बताया जा रहा है और अनेकों की हत्याएँ भी की गईं हैं। इस संकलन के लेख छः भागों में विभक्त हैं जिसमें इतिहास-संस्कृति से लेकर दलित पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के वे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जिन पर फासीवादी राजनीति का सबसे ज़्यादा प्रभाव देखने में आ रहा है।