लोअर मिडिल-क्लास’ हमारे समाज की पुरानी व्यवस्था एवं उसके रीति-रिवाज व मर्यादा का निर्वाह करने में हमेशा से सफल रहा है परन्तु अब उसका ‘युवा-वर्ग’ आज के परिवर्तनों में तेजी से बदलाव की ओर झुका है। इन दिनों ‘निजी-संबंधों’ को लेकर हमारा ‘कानून’ भी अपेक्षाकृत काफी उदार हुआ है और ये ‘लिबर्टी’ युवाओं को परोक्ष-रूप से आकर्षित तो करती ही है। युवा अब हताश है..क्योंकि करना तो वह भी बहुत कुछ चाहता है लेकिन एक ‘लोअर-मेंटालिटी’ उसके ‘घर की परिस्थिति’ व ‘संस्कारों’ का वास्ता देकर उसको अपने कदम पीछे खींच लेने को बाध्य करती है;.. नतीजा- कुंठा और मानसिक-अशांति! युवाओं की ‘इमोशनल-थ्रस्ट’ को नकारना घातक है भावनाएं ‘हर्ट’ होती हैं तो ‘युवा’ टूटता है हादसे होते हैं। यौवन की पहली ‘मांग’ है- ’इमोशनल-जस्टिस’! जिंदगी की ‘इमोशनल-वेव’ को ‘किलोमीटरों’ में नहीं;..उसे तो ‘सेंटीमीटर’ जैसे छोटे-छोटे ‘सेगमेंट’ में ही ‘एचीव’ किया जा सकता है।