इस संकलन की रचनाएँ पढ़ने और उन्हें आत्मसात करने से पहले एक बार मुड़ कर देखें कि पग कितनी दूरी नाप गये हैं। बरस तो बीत गये लेकिन रस-रंग स्नेह-सगाई प्रणय-परिणय सब कुछ एक सा नहीं रहा। कभी मन खिला कभी नीर बहे या मूक ही सह गया जीवन. न किसी ने पूछा जगती में न ही वह अपनी सुना सका। केवल चलता रहा तन पीठ पर धूप लिये छाँव की आशा में। धूप-छाँव कई छोटी-छोटी भावनाओं से जुड़ी कविताएँ है। इन की पंक्तियों मे एक पुकार है-समर्पण है। छाँव के बाद अब धूप में चलिये और पढ़ते हुये उन पंक्तियों मे गुंथा सच ढूंढ लीजिये...
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