सुशोभित का यह चौथा कविता संग्रह है। उनके पहले संग्रह ''गुलमोहर'' में रागात्मकता की उत्कट अभिव्यक्ति थी तो ''दैनन्दिनी'' में विषाद-योग फलीभूत हुआ था किन्तु ''धूप का पंख'' तक आते-आते हम कह सकते हैं कि कवि का स्वर अधिक स्थिर प्रौढ़ संयत और ऊर्जस्वित हुआ है और विषयों में वांछित विविधता और व्याप्ति चली आई है। सुशोभित के रचनात्मक विकास की यात्रा में इस संग्रह को उनके काव्य-उद्यम की प्रतिनिधि पोथी कहना भी तब अनुकूल ही होगा।