ध्यानयोग सम्पूर्ण विश्व में आध्यात्मिक योग प्रक्रिया के रूप में विख्यात है। ध्यान के द्वारा पुरातन सनातनियों ने अत्यधिक मात्रा में आत्मसंयम तो अर्जित किया ही साथ ही एक ऐसी शक्ति का आविष्कार किया जो बाह्य जगत की घटनाओं को प्रभावित कर सके। सदियों से भारतीय चिंतन और अध्यात्म में आत्म-साक्षात्कार का विषय रहा ध्यानयोग आज भी मोक्ष प्राप्ति का अचूक उपाय है। वेदों में हमें ध्यान की पद्धति पर अधिक निर्देश नहीं मिलते हैं। इसका प्रधान कारण यह हो सकता है कि वैदिक काल में मन्त्र जप आदि स्तुतियां अनुष्ठान आदि विषयक विस्तृत निर्देश मौखिक रूप से दिए जाते थे। प्रस्तुत पुस्तक में आत्मा मृत्यु ब्रह्म और ध्यान जैसे गंभीर विषयों का यथार्थ और सारगर्भित वर्णन किया गया है। पुस्तक का प्रमुख उद्देश्य आत्मसंयम और आत्म-साक्षात्कार की ओर अग्रसर होने का मार्ग व्यावहारिक रूप से प्रशस्त करना है। गीता काव्य के उद्धरणों से सुसज्जित यह पुस्तक ‘ध्यान पथ’ निश्चय ही पाठक के लिए संजीवनी का कार्य करेगी जो जीवन और आत्म-साक्षात्कार को समझना चाहते हैं साथ ही इसके प्रयोग का आनंद भी लेना चाहते हैं।