Vichar Pravah (विचार प्रवाह)


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About The Book

मन की अनुभूतियां जब ठोस स्व रूप ग्रहण करती हैं तब जन्म होता है वि चारों का। वि चार हमारे अनुभव हमारी सोच की अभि व्यक् ति हैं और वह अपनी प्रकृति से ही सामाजिक होते हैं क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्रा णी है वह अकेला नहीं रह सकता है सबसे कटा अकेला मनुष्य या तो देवता है या दानव। वह मानव नहीं हो सकता है। मानसिक रोगी भी सामाजिक जीवन की त्रासदियों का शिकार होता है। उसके अलगाव में समाज कहीं-ना-कहीं उपस्थिति आवश्यक होता है। सामाजिक प्राणी के रूप में मनुष्य समाज के उतार-चढ़ा व दशा -दिशा और उसके गुण-दोष के प्रति जागरुक रहते हुए उनका प्रत्यक्ष गवाह होता है और अपनी प्रतिक्रिया को व्यक्त करता है। यह प्रतिक्रिया नकारात्मक और सकारात्मक दोनों प्रकार की हो सकती है। नकारात्मक प्रतिक्रिया समाज को बर्बादी के रास्ते स्ते पर ले जाती है तो सकारात्मक प्रतिक्रिया समाज को प्रगति के पथ की ओर अग्रसर करती है। इसी प्रतिक्रिया को हम वि चार कहते हैं।
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