Doctor Dada (Pratiksha ke Pal)


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About The Book

हाँ बेटा देविना ठीक कह रही है मिलन के पल विदाई की ओढ़नी ओढ़कर ही आते हैं।शिवि- बहुत बड़ा सौदा कर लिया मौसी जी! पिता-पुत्री को एक ही डील में खरीद लिया।शेखर- तो तुमने चंद सिक्कों के लिए मुझसे मेरी बेटी को छीन लिया। इतनी बेदर्द मत बनो शालू आखिर मैं उसका पिता हूँ ।शालू- मेरे भी तो पति हो पिता तो मैं तुम्हें फिर भी बना दूँगी पर याद रखना पति बड़े मुश्किल से बने हो।शुभम- इस दर्द ने ही शायद तुम्हें लेखक बना दिया है वरना ये दिन उपन्यास लिखने के नहीं पढ़ने के होते हैं।काम्या- ये शादी का एग्ज़ाम है दीदी इसका रिज़ल्ट पहले आता है एग्ज़ाम बाद में होते हैं।आज समय निकालकर दोस्तों के पास आए हो पहले समय निकालने के लिए दोस्तों के पास आते थे।डॉ. साहब! हम डॉक्टर नहीं जो बीमारी के बाद इलाज करें। नेता हैं जो बीमारी से पहले ही इलाज कर देते हैं। हम हवा के रुख को पहचानते हैं।आर्य सर ! रूप प्यारा होता है रूपांतरण नहीं। शिवानी ने हमारे साथ सात जन्मों के फेरे लिए थे पर हम एक जन्म का साथ भी नहीं निभा पाए।यस अंकल ! बेटियाँ तो बेगानी जैसी ही होती हैं। आज पिता के द्वार कल पति के घर। दो घरों के बीच सफ़र में ही उसका जीवन गुजर जाता है।हम अभी एक रुपए के सिक्के हैं सौ का सिक्का मत बनाइए।तृप्ता- क्या डॉक्टरों के दिल में प्यार का दीपक नहीं जलता रश्मि बेटी! प्यार प्राणी को बच्चा ही बनाए रखता है बूढ़े नहीं होने देता। प्यार में प्रेमी कब्र में भी अपने महबूब का इंतज़ार करते हैं।इसी उपन्यास से.......
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