ये पुस्तक लगभग तीन दशकों का एक लंबा सफ़र है जिसमें दादा के कंधे पर बैठ कर खेत देखने से लेकर अपने बच्चे को कंधे पर बिठाकर चाँद दिखाने तक के अनुभव कविताओं के रूप में लिखे गए हैं। इन कविताओं में पिता की साइकल पर बैठकर स्कूल जाने का कौतुक है माता-पिता व घर के अन्य बुज़ुर्गों से सुनी कहानियों का सार है खेतों में जाकर तोड़े गए गन्ने की मिठास है सुबह तीन बजे बाग में जाकर बीने गए देसी आमों का रस है निष्पाप प्रेम की फुहार है गाँव से नगर और नगर से महानगर में पलायन का संघर्ष और पूरी तरह से नाउम्मीद हो चुके जीवन के दुबारा खड़े होने की दास्तान सब मिलेगा यहाँ पूरी ज़िन्दगी मिलेगी चंद कविताओं के रूप में।