आचार्य चतुरसेन जी साहित्य की किसी एक विशिष्ट विधा तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने किशोरावस्था में कहानी और गीतिकाव्य लिखना शुरू किया बाद में उनका साहित्य-क्षितिज फैला और वे जीवनी संस्मरण इतिहास उपन्यास नाटक तथा धार्मिक विषयों पर लिखने लगे। शास्त्रीजी साहित्यकार ही नहीं बल्कि एक कुशल चिकित्सक भी थे। वैद्य होने पर भी उनकी साहित्य-सर्जन में गहरी रुचि थी। उन्होंने राजनीति धर्मशास्त्र समाजशास्त्र इतिहास और युगबोध जैसे विभिन्न विषयों पर लिखा। ‘वैशाली की नगरवधू’ ‘वयं रक्षाम’ और ‘सोमनाथ’ ‘गोली’ ‘सोना और खून’ (चार खंड) ‘रक्त की प्यास’ ‘हृदय की प्यास’ ‘अमर अभिलाषा’ ‘नरमेघ’ ‘अपराजिता’ ‘धर्मपुत्र’ पत्थर युग के दो बुत दुखवा मैं कासे कहुं और पूर्णाहुति सबसे ज्यादा चर्चित कृतियाँ हैं।
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