ये व्यंग्य समाचार-पत्रों से आयातित व्यंग्य नहीं हैं न ही मैं राष्ट्रीय चिंता के मुद्दों पर व्यंग्य का शंखनाद करने वाला हूँ। धर्म राजनीति और देशव्यापी भ्रष्टाचार से उपजे व्यंग्य बड़े लेखकों के विषय हैं। मेरे व्यंग्य तो मेरे आसपास से उठाये हुये हैं। हर वो बात जिससे मैं थोड़ा परेशान हुआ हूँ उस पर मेरी लेखनी चल पड़ी है। कदाचित इसलिए भी मैंने अपने व्यंग्य संग्रह का शीर्षक 'एक परेशान आत्मा' रखा है। —द्वारिका वैष्णव