Ek Anaam Patti Ka Smarak । एक अनाम पत्ती का स्मारक

About The Book

नरेश सक्सेना समकालीन हिंदी कविता के एक ऐसे कवि हैं जिन्हें सभी पीढ़ियाँ गहरा सम्मान देती हैं। उनकी कविताओं के लिए प्रायः लंबी प्रतीक्षा करनी होती है। कविता रचने के साथ-साथ वह बाँसुरी और माउथ-ऑर्गन भी तन्मय होकर बजाते हैं।इंजीनियरिंग के क्षेत्र में वह अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं पर कंसल्टेंट रहे हैं और साथ ही फ़िल्म नाटक और संगीत के विविध क्षेत्रों में भी सक्रिय रहे। उन्होंने लघु फ़िल्में सीरियल और डॉक्यूमेंट्री-फ़िल्मों का निर्माण किया तथा फ़िल्म-निर्देशन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किया।आईआईटी कानपुर और सागर विश्वविद्यालय की मुक्तिबोध सृजन पीठ पर आयोजित उनकी कार्यशालाएँ इस बात की साक्षी हैं कि वह कविता को केवल लिखते ही नहीं; बल्कि उसे सिखाने साझा करने और इस दौरान सीखने वालों से भी सीखने की कला जानते हैं।यह कोई साधारण संयोग नहीं कि वह पानी के इंजीनियर रहे क्योंकि पानी उनके लिए मात्र विषय नहीं बल्कि वह प्राणतत्त्व है जो पृथ्वी को चाँद से अलग करता है। उनकी रचनाओं में विज्ञान और कला का दुर्लभ संगम मिलता है एक ऐसा दृष्टिकोण जिसमें मुक्तिबोध परसाई ज्ञानरंजन और विनोद कुमार शुक्ल जैसी सृजनशील परंपराएँ आइंस्टाइन और स्टीफ़न हॉकिंग की जिज्ञासु दृष्टि से सहज रूप में जुड़ जाती हैं। इसीलिए उनकी कविता हमारे समय की सबसे जीवित और सबसे विश्वसनीय गवाही की तरह पढ़ी जाती है।उनकी कविताएँ केरल जम्मू-कश्मीर पंजाब महाराष्ट्र सहित अन्य प्रांतों में पहले दर्जे से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक पाठ्यक्रमों में शामिल हैं। इसके साथ ही वह पहल सम्मान कबीर सम्मान जनकवि नागार्जुन सम्मान भवभूति अलंकरण परसाई सम्मान और कविताकोश जैसे अनेक सम्मानों से सम्मानित हैं।
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