Ek Aur Ek Dhai ( एक और एक ढाई )
Hindi


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About The Book

<p>कोई रिश्ता बनता है तो दो व्यक्तित्वों के साथ उनकी आदतें उनकी भावनाएँ उनकी महत्वाकांक्षाएँ&nbsp; उनके और लोगों के साथ सम्बन्ध एवं जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण भी उस रिश्ते के आवश्यक अंग बनते हैं यही हैं दो व्यक्तियों के परस्पर सम्बन्ध में अतिरिक्त आधा जो एक और एक को ढाई बना देता है।</p><p>‘एक और एक ढाई’ सात ऐसी ही कहानियों का संग्रह है जिनमें रिश्तों के इस अतिरिक्त आधे की महत्वपूर्ण भूमिका है।</p><p><strong>अजीब लड़की&nbsp;</strong></p><p>“मन से प्यार करो तो एक साथ चार क्या चालीस लोगों से भी प्यार किया जा सकता है।”</p><p><strong>इति</strong></p><p>“प्रेम के बाद विवाह केवल एक दूसरे के शरीरों पर आधिपत्य प्राप्त करने का मार्ग है।”</p><p><strong>संतुष्टि की परिधि&nbsp;</strong></p><p>“स्त्री को पेट भर रोटी मिले ना मिले योनि भर लिंग मिलता रहे तो वो वफादारी कभी ना छोड़े।”</p><p><strong>गुलाब के फूल&nbsp;</strong></p><p>“जन्म देते समय माँ को होने वाला दर्द उसकी चीखों के जरिये दिख जाता है पर बच्चे को भी तो दर्द होता होगा। वो बता नहीं पाता इसलिए उसके दर्द की बात कोई नहीं करता।”</p><p><strong>लाल साड़ी वाला आदमी&nbsp;</strong></p><p>“हम सिर्फ इन्सान बने रहना नहीं चाहते। हम अलग-अलग क्षणों में जो महसूस कर रहे होते हैं हम वो बनना चाहते हैं।”</p><p><strong>गुप्त उपहार&nbsp;</strong></p><p>“ह्यूमन एनाटॉमी का एक सिस्टम ऐसा भी होना चाहिए कि प्यार तभी हो जब आप अच्छा कमाने लग जाओ। वरना कभी प्यार होना ही नहीं चाहिए।”</p><p><strong>विद्रोहिणी&nbsp;</strong></p><p>“कुत्ते की लार के भी होत हैं। बस एक मरदजात की लार के उसूल न होत।”&nbsp;</p>
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