मेरी आत्मकथा का यह दूसरा खंड आपके हाथ में है पिछले खंड में मैंने अपने पूर्वजों माता-पिता अन्य स्वजनों अपने जन्म तथा पालन-पोषण के बारे में लिखा था उसके बाद किस प्रकार कष्टसाध्य ग्रामीण विद्यालयों के परिवेश में मेरी शिक्षा आदि हुई और परिस्थितियों ने बार-बार अपने लक्ष्य से मुझे भटका दिया उसका भी उल्लेख है किंतु मुझे जो भी मिला वह मेरे लक्ष्य से अच्छा मिला जिसे आदिशक्ति जगदंबा का प्रसाद जानकर ग्रहण करता गया मुझे अनुभव हुआ कि कृपा कष्ट के साथ मिलती है तभी कृपालु के प्रति श्रद्धा और विश्वास प्रगाढ़ होता जाता है \