एक्सप्रेसवे सिर्फ एक किताब नहीं यह सपनों संघर्षों और बदलाव की दास्तान है। ननकऊ अपनी मासूमियत में दुनिया खोज रहा है जबकि मदन चाचा अपनी खोई हुई ज़मीन और पहचान। गौरी ने एक्सप्रेसवे के सहारे नई राह बनाई और दीपेश एक आईटी प्रोफेशनल अब भी टूटी सड़कों और लखनऊ में बसे अपने माता-पिता के बीच फँसा है। ये कहानियाँ आपको हँसाएँगी रुलाएँगी और सोचने पर मजबूर करेंगी। अगर आप ज़िंदगी के बदलते रंगों को महसूस करना चाहते हैं एक्सप्रेसवे आपका इंतज़ार कर रही है।
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