हिंदी के कालजयी रचनाकारों में फणीश्वरनाथ 'रेणु' का नाम निःसंकोच लिया जा सकता है। महान रचनाकार समय के साथ-साथ और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। ‘रेणु भी समय के साथ-साथ हर युग में प्रासंगिक होते जाते हैं। अपने समय के हर स्पंदन का अनुभव करते जीवन की हर लय को गुनगुनाते समाज में रच-बस कर उसकी एक-एक परत को चित्रित करते रेणु वह कथाकार हैं जिनकी रचनाएँ सामाजिक के लिए अद्भुत आनंद की सृष्टि करती हैं। वह आचलिक कथाकारों में सर्वश्रेष्ठ हैं किन्तु वह किसी अंचल-विशेष के नहीं समग्र भारत के शब्द-चित्रकार हैं। उनकी रचनाएँ सामाजिक-संरचना सामाजिक विघटन सामाजिक न्याय-अन्याय और समाज के हर स्तर का चित्रण करती हैं। वे दयनीय को मस्नीय बनाने वाले रचनाकार हैं। उनके कथा-साहित्य में साधारण लगने वाले असाधारण पात्र हैं। जीवन अपनी परिपूर्णता में उनके साहित्य में बहता है। राग का अविरल प्रवाह इस जीवन-सरिता को उज्ज्वल और जीवंत बनाए रखता है। चौहद्दिओं से मुक्त राष्ट्र उन्नत एवं वर्गविहीन समाज रेणु के साहित्य का मुख्य स्वर है। किन्तु यह महान कथाकार जिन अर्थों में अप्रतिम है वह है उसका मानव और मानवीयता के प्रति उसकी संबद्धता और प्रतिबद्धता। वह मानव के हर दुःख से दुःखी होते हैं और हर मानव के अघरों पर एक धुली-धुली सी मुस्कान बिखेर देना चाहते हैं। लोक-जीवन और लोक-कलाओं का यह जीवंत रचनाकार विस्तृत अर्थों में मानव-लोक का अद्वितीय चितेरा है। उनका साहित्य सच्चे अर्थों में राग का अनुराग का आनंद का साहित्य है। उनके संपूर्ण कथा-साहित्य के द्वारा इसी जीवन और उसमें व्याप्त आनंद का संचरण करना ही अभीष्ट है।