जयमति में एक विशेष बात यह है कि उसके भीतर मन में एक संगीत बजता रहता है। वह भीतर-ही-भीतर गुनगुनाती रहती है। यह उसकी ताक़त है। वह कुछ भी सोचती है उसमें यह संगीत भी अपना काम कर देता है। उसके निर्णय में भी संगीत का काम होता है किसी में कम किसी में ज़्यादा। यह संगीत ग्राम के सभी लोगों के भीतर होता है। सभी इसे मन-ही-मन गुनगुनाते रहते हैं। इसी का कहीं-न-कहीं जोड़ होता है जिसे गाँवपन कहते हैं। सबके सब रोज़ाना जंगल जाते हैं। वहाँ की सरसराहट वहाँ की साँय-साँय में तो एक संगीत होता ही है जंगल के सुनसान और बियाबान में भी संगीत होता है जो सबके भीतर समा जाता है। जंगल से इनका इस तरह एक आदिम रिश्ता है। मन-ही-मन चलने वाला यह अनोखा संगीत है। जयमति में यह कुछ ज़्यादा है। यह मथुरा दर्जी के मन के संगीत से अलग है। यह रघ्घू के संगीत से भी अलग है। दुकान खोलते समय और लोगों को दुकान का सामान देते हुए जो रघ्घू गुनगुनाता है वो जयमति के गुनगुनाने से बिल्कुल अलग है। यह सब अपने आप है। इसी संगीत के कारण ये रात-रात भर आनंदित होकर नाचते हैं गाते हैं। यहाँ रहते-रहते गुरुजी के भीतर भी मन का संगीत बजने लगा है। वह भी मन-ही-मन गुनगुनाते रहते हैं और आनंदित होते रहते हैं।
Piracy-free
Assured Quality
Secure Transactions
Delivery Options
Please enter pincode to check delivery time.
*COD & Shipping Charges may apply on certain items.