हिन्दी साहित्य एक विशाल शब्द सागर है। हिन्दी में जब किसी साहित्य की रचना होती है तो उसमें तत्सम तद्भव और देशज शब्दों का प्रयोग होता है लेकिन जब विशुद्ध साहित्य लिखा जाता है तो अधिकतर तत्सम् और तद्भव शब्द का ही प्रयोग होता है। उनमें देशज शब्दों का प्रयोग प्रायः नहीं होता है लेकिन जब सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य पर विचार किया जाता है तो देशज शब्दों को भी विषय के अन्तर्गत रखा जाता है। हिन्दी साहित्य में कई ऐसे कहानीकार उपन्यासकार और लेखक हुए हैं जिन लोगों ने अपने साहित्य में देशज शब्दों का काफी प्रयोग किया है- जैसे- प्रेमचंद का ""गोदान"" फणीश्वर नाथ रेणु की “परती परिकथा नागार्जुन का “बलचनमा"" आदि इस तरह के कई उपन्यास और कहानियां हैं जिनमें ग्रामीण शब्दों का प्रयोग किया गया है।