गरीबी किसी एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। यह मुंबई की तंग गलियों से लेकर न्यूयॉर्क की झुग्गियों तक फैली है। यह उप-सहारा अफ्रीका के मिट्टी के घरों में भी है ब्राज़ील के स्लम्स में सीरिया के शरणार्थी शिविरों में और बांग्लादेश के गाँवों में भी। चेहरे बदलते हैं लेकिन दर्द भूख और अपमान का अनुभव हर जगह एक जैसा है।विश्व बैंक के अनुसार दुनिया की लगभग 9% जनसंख्या — यानी 700 मिलियन से अधिक लोग — प्रतिदिन $2.15 ( 190 ) रु० से भी कम में गुजारा करते हैं। लेकिन गरीबी सिर्फ पैसों की कमी नहीं है — यह स्वच्छ पानी स्वास्थ्य सेवा शिक्षा और गरिमा की अनुपलब्धता है।शिक्षा गरीबी के खिलाफ सबसे शक्तिशाली हथियार है — लेकिन गरीबी ही शिक्षा में सबसे बड़ी बाधा बनती है। जिन परिवारों को दो वक्त की रोटी जुटानी मुश्किल हो वे बच्चों को स्कूल नहीं भेज सकते। स्कूल चाहे मुफ्त हों लेकिन किताबें यूनिफॉर्म यात्रा खर्च — ये सब उनके लिए लग्ज़री बन जाते हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ अरबपति अंतरिक्ष की दौड़ में हैं और वहीं करोड़ों लोगों के पास सिर ढँकने को छत नहीं है। जहाँ हर साल मोबाइल अपग्रेड होते हैं लेकिन कई गाँवों में अभी भी बिजली नहीं पहुँची है। अमीर और गरीब के बीच की खाई सिर्फ धन की नहीं — अवसरों आवाज़ और इंसानियत की भी है।