इस नाटक ‘गाथा खाटूश्याम की’ का लेखन उनके पिता श्री घटोत्कच जी के विवाह से प्रारम्भ हुआ है तथा श्री खाटूश्याम जी अर्थात श्री बर्बरीक जी की तपस्या एवं वरदान प्राप्ति तथा उनके शीश दान तक की सम्पूर्ण गाथा को एक नाटक के रूप में प्रगट करने का प्रयास किया गया है; जिससे भक्तजन उनके जीवन चरित्र पर आधारित नाटक को देखकर भावविभोर हो सकें एवं भक्ति में गोता लगा सकें।